ai watan mere tujhe dilo jaan se chaha hai
प्रभात की कलम से नाम जब भी वतन का आता है, खुद पे ही गुमान हो जाता है नाज़ है कि हम हिंदुस्तानी हैं, और वतन ये हिन्दोस्ताँ हमारा है ऐ वतन मेरे तुझे दिलोजान से चाहा है ऐ वतन मेरे तुझे दिलोजान से चाहा है जितना सोचा था उससे कहीं बढ़के पाया है ऐ वतन मेरे तुझे दिलोजान से चाहा है तुझ संग ही तो खेली मैंने पहली ये होली सबसे पहले खायी तेरी मिट्टी की गोली उस मिट्टी संग तू भी मेरे दिल में समाया है ऐ वतन मेरे तुझे दिलोजान से चाहा है तेरी जमीं में ही बिता है मेरा ये बचपन तुझ से ही तो पूरे हुए सब मेरे ये सुख स्वप्न ऐसा लगता है जैसे तू मेरा साया है ऐ वतन मेरे तुझे दिलोजान से चाहा है तुझसे ही तो सीखी मैंने जीवन की हर बात इतना काबिल तूने बनाया दे दूँ सबको मात शक्ति बनकर तू ही मेरे मन में समाया है ...