Rakshabandhan
A poem written by me depicting my life till now and the role of
my sisters in nurturing and shaping it..... #Rakshabandhan #missing #love
राखी त्योहार नही सिर्फ धागों का
ये तो पर्व है कुछ वादों का
कुछ भूल बिसरी यादों का....
कई मन्नतों के बाद मुझको पाया था
मेरी बहनों की राखी ने मुझे जहाँ में बुलाया था
मैं था नन्हा सा नटखट चंचल सुंदर सौम्य सलोना
उन सब के लिये तो था मैं एक अनमोल खिलौना
बचपन का वो प्यार, जब हँसी ठिठोली करते थे
वो मीठी सी तकरार, जब हँसते लड़ते रोते थे
प्रेम का वो दरिया जिसमें मैं डूबा रहता था
ममता की वो छाँव जिसमें मैं सोया करता था
सुबह से शाम, शाम से सुबह ना जाने कैसे होती थी
मुझे कुछ हो जाये तो मेरी बहनें ज्यादा रोती थी
मेरी कामयाबियों की खुशी मुझसे ज्यादा सबको होती थी
हर दिन हर पल भर भर के मुझको दुआयें देती थी
रोज नया "प्रभात" बन, मैं चढ़ता गया नये शिखर
पर रिश्तों की वो गर्माहट तो जाती थी हर रोज बिखर
मैं सही और सब गलत, इसी गुमान में जीने लगा था मैं
प्यारे खून के रिश्तों को भी कहीं पीछे छोड़ने लगा था मैं
पर बहनों ने तो जैसे ठान लिया था मेरी
कुछ भी कर ले तू हम भी तेरा साथ नही छोड़ेंगी
जब जब ठोकर लगी मुझे बहनों ने ही दिया सहारा
वरना मैं तो कब का हार चुका था अपना जीवन सारा
जब अक्ल खुली, और रिश्तों की गरिमा को जान पाया
तब तक सारी बहनों को ससुराल में उनके पाया
पर ये भी खूब कि, बहनों के संग मिले ऐसे बहनोई
जिन्होनें भाई से भी बढ़कर मुझसे प्रीत निभाई
फिर बहनों ने दिये मुझे ऐसे अनमोल उपहार
भांजे भांजियों की किलकारी से महक उठा प्रभात परिवार
"गुटलू" में दिखता उनको मेरा नटखट बचपन
"गुन्नू, डॉलू और नैनो" में वो जीती हैं अपने स्वप्न
एक और उपकार अनूठा किया मेरे जीवन पर
इक प्यारी जीवनसाथी दे रौशन कर दिया मेरा घर
सोचता हूँ क्या फिर अपने आँगन में ऐसा "भानू" उदय होगा
Miss u all Didi.... Thanks for being such lovely, caring
and sometimes खरूस sisters....
Happy Rakshabandhan...
..........सौरभ प्रभात भानू
my sisters in nurturing and shaping it..... #Rakshabandhan #missing #love
राखी त्योहार नही सिर्फ धागों का
ये तो पर्व है कुछ वादों का
कुछ भूल बिसरी यादों का....
कई मन्नतों के बाद मुझको पाया था
मेरी बहनों की राखी ने मुझे जहाँ में बुलाया था
मैं था नन्हा सा नटखट चंचल सुंदर सौम्य सलोना
उन सब के लिये तो था मैं एक अनमोल खिलौना
बचपन का वो प्यार, जब हँसी ठिठोली करते थे
वो मीठी सी तकरार, जब हँसते लड़ते रोते थे
प्रेम का वो दरिया जिसमें मैं डूबा रहता था
ममता की वो छाँव जिसमें मैं सोया करता था
सुबह से शाम, शाम से सुबह ना जाने कैसे होती थी
मुझे कुछ हो जाये तो मेरी बहनें ज्यादा रोती थी
मेरी कामयाबियों की खुशी मुझसे ज्यादा सबको होती थी
हर दिन हर पल भर भर के मुझको दुआयें देती थी
रोज नया "प्रभात" बन, मैं चढ़ता गया नये शिखर
पर रिश्तों की वो गर्माहट तो जाती थी हर रोज बिखर
मैं सही और सब गलत, इसी गुमान में जीने लगा था मैं
प्यारे खून के रिश्तों को भी कहीं पीछे छोड़ने लगा था मैं
पर बहनों ने तो जैसे ठान लिया था मेरी
कुछ भी कर ले तू हम भी तेरा साथ नही छोड़ेंगी
जब जब ठोकर लगी मुझे बहनों ने ही दिया सहारा
वरना मैं तो कब का हार चुका था अपना जीवन सारा
जब अक्ल खुली, और रिश्तों की गरिमा को जान पाया
तब तक सारी बहनों को ससुराल में उनके पाया
पर ये भी खूब कि, बहनों के संग मिले ऐसे बहनोई
जिन्होनें भाई से भी बढ़कर मुझसे प्रीत निभाई
फिर बहनों ने दिये मुझे ऐसे अनमोल उपहार
भांजे भांजियों की किलकारी से महक उठा प्रभात परिवार
"गुटलू" में दिखता उनको मेरा नटखट बचपन
"गुन्नू, डॉलू और नैनो" में वो जीती हैं अपने स्वप्न
एक और उपकार अनूठा किया मेरे जीवन पर
इक प्यारी जीवनसाथी दे रौशन कर दिया मेरा घर
सोचता हूँ क्या फिर अपने आँगन में ऐसा "भानू" उदय होगा
जिस "प्रभात" में हम सब भाई बहनों का फिर सुखद "सौरभ" फैलेगा ...
Miss u all Didi.... Thanks for being such lovely, caring
and sometimes खरूस sisters....
Happy Rakshabandhan...
..........सौरभ प्रभात भानू

Lovely poem..
ReplyDeleteThanks
Delete